Skip to main content

तू इश्क़ नहीं मेरा मगर प्यार है तुझसे

तू इश्क़ नहीं मेरा, मगर मुझे प्यार है तुझसे
तू चांद नहीं मेरा, मगर मेरी रौशनी है तुझसे
तू आसमां भी नहीं मेरा, मगर मेरी हर छाव है तुझसे
बेसब्री लिए खोजती है तुझे निगाहें
मगर सब्र है कि तेरी परछाई से हाल पूछ लेते है
माना मयस्सर तू नहीं है मेरे हिस्से
मगर तेरी बातों कि एक किताब सी बुन लेते है
सागर से मिलने का एक शौक़ है मुझे
मगर मैं वो दरिया नहीं जो लहरों में समा सके
माना तेरे बज़्म-ए-हयात में एक लम्हा भर ही हूं
मगर उन लम्हों में ही कुछ सदियों सा जी लेता हूं
तुझसे मुझसे कुछ यादें जुड़ी है
घड़ियों को शाद करती कुछ बातें जुड़ी है
कहे अनकहे कुछ अल्फ़ाज़ बिखरे से है
मगर वो कलम वो कागज़ नहीं जिनमें समेट सके इनको
साज है आवाज़ है, मगर परवाज़ नहीं
तू आइना है मेरा, मगर मेरा वजूद नहीं तुझसे
तू आदत नहीं मेरी, मगर मेरी ज़रूरत है तुझसे
तू इश्क़ नहीं मेरा, मगर मुझे प्यार है तुझसे।

Like our page on Facebook
Follow us on Instagram

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

परिकल्पना - सफ़र जिंदगी का

हम एक जीवन की कल्पना करते है फिर उस परिकल्पना में रंग भरते है कुछ छोटी कुछ बड़ी आशाएं, कुछ यादें, कुछ बातें, लम्हों कि सौगातें कुछ आकांक्षायें पहलू में समेट लेते है कुछ बस एक काश में ही सिमट जाते है कुछ जिरह, कुछ विरह, कुछ जद्दोजेहद सब मिल कर स्याह बनकर कोरे पन्नों पर कुछ लिखना चाहते है, किरदार सजते है, कुछ किस्से संवरते है कुछ दाग बनकर वहीं रह जाते है। हम खुशियां समेटते है सन्नाटे छाटते है चलते है, भागते है, हांफते है, थक कर दहलीज पर बैठ जाते है सांस लेने की कवायद करते है, लड़ते है एक उम्मीद लिए आसमां में तैरते है एक तिनका पकड़ते है चांद पर बैठ जाते है कभी बादलों से उलझकर गिर जाते है और सागर की गहराइयों में खो जाते है उस शून्य में रंग सारे सफेद हो जाते है पीछे बचती है एक लकीर काले स्याह रंग की, अंधकार समेटे जो जमीं को आसमां से जोड़ती है यादों की बारिश उस लकीर को सिंचती है कुछ टहनियों को जन्म देती है जो एक आखरी सफर को छाव देते है हम चलते जाते है, अकेले उस सफर पर और कल्पनाएं, जिनमें कुछ रंग भरे थे फूल बनकर बिखरते जाते है कांटे जो पावों में छुपे थे, चुभे थे ...

मैं कुछ नहीं, मैं कोई नहीं

मैं कुछ नहीं, मैं कोई नहीं आरज़ू नहीं, कोई आबरू नहीं चमक नहीं, मैं फलक भी नहीं, दिल नहीं, मुझमें जां भी नहीं, साया नहीं, कोई साथी नहीं मैं कुछ नहीं, मैं कोई नहीं। सुबह नहीं, अब शाम नहीं सच नहीं ना कोई जूठ नई दिन भी वहीं रातें वहीं सांस वहीं, पर बातें नहीं मैं कुछ नहीं, मैं कोई नहीं। आगाज़ नहीं, अंज़ाम नहीं मैं शब्द नहीं कोई आवाज़ नहीं, किस्से नहीं, कहानी नहीं किरदार वही पर राज़ नहीं मैं कुछ नहीं मैं कोई नहीं। मैं गंगा नहीं, यमुना भी नहीं, पाप वही, अब पुण्य नहीं तीर्थ नहीं, कोई धाम नहीं पर्वत वही, पर हिमालय नहीं मैं कुछ नहीं, मैं कोई नहीं। दुश्मन नहीं पर दोस्त वही, मैं फिज़ा नहीं, रूत भी नहीं, अपना नहीं, ना गैर सही मंज़िल वही मैं रस्ता नहीं मैं कुछ नहीं मैं कोई नहीं। मैं पूरब नहीं पश्चिम नहीं सूरज वही, मैं दिशा नहीं मैं मिला नहीं, भटका भी नहीं आदमी वही कोई मुखौटा नहीं मैं कुछ नहीं, मैं कोई नहीं। Like our page on Facebook Follow us on Instagram

अब तुमसे विदा लेता हूं

चलो तुम्हें आज़ाद करता हूं अपनी इस तन्हा जिंदगी से यूं तो तुम मेरे हुए नहीं कभी फिर भी जो ये एहसास कभी तुम्हारे नाम के थे आज इनसे विदा लेता हूं ये जो तुम्हारी बातें थीं जो कभी मेरे दिनों को यूं गुलज़ार करती थी तुम्हारी आहटें जो मुझे बेचैन कर देती थी कभी वो रूबरू होना तुमसे वो तुम्हारी यादों के साथ शाम से सहर होना तुम्हारे ही ख्वाबों के साथ हर रात हर राज़ बाटना अब इन सबसे भी विदा लेता हूं विदा लेता हूं कि अब लौट के वापस इन बायाबानो में फिर कदम नहीं लाऊंगा राब्ता तेरे नाम से जहां भी मैं पहचाना जाता था उन रास्तों से भी अब विदा लेता हूं चलता हूं कि हो सके तो याद रखना कभी तुम्हारी राहें बनाई थी कांटों को झेल कभी तुम्हें कलियों सा सजाया था तुम्हारी जिन्दगी तो नहीं बन सका पर याद रखना कि कम से कम एक ज़रिया भर ही था तुम्हारी तन्हाइयों, तुम्हारी ऊचाईयों का वक़्त बेवक्त वो दस्तक देती तुम्हारी हर बेचैनियों का। चलता हूं कि नए रास्ते अब पुकार रहे है जीने की जो थोड़ी लालसा दिल में दबी बची है वो आवाज़ दे बुला रहे है वो छोटे छोटे वक़्त के लम्हें जिनसे बुना उधरा ...