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Showing posts with the label Hindi Kavita

कुछ कहना है तुमसे

सुनो, कुछ कहना है तुमसे क्या, कैसे, कब, नहीं पता मगर फिर भी कुछ कहना है तुमसे। शब्द नहीं है, होंठ भी कुछ कांपते से है मन भी आशंकित सा हुआ जाता है बोलना बहुत कुछ है इसे मगर कहने से डरता भी बहुत है। शायद कुछ उलझा सा हुआ है तुम्हें तुमसा देख कर ये मन, शब्दों में अथाह सागर के बीच भी अतृप्त, आवाक, विचलित रह जाता है वो डूबना चाहता है, तैरना भी पर वो सागर कदम पड़ते ही रेत हुआ जाता है क्यों, कैसे कुछ मालूम नहीं। फिर भी कुछ कहना है तुमसे, मुझे झुमके बहुत पसंद है बाज़ार से खरीदे थे, तुम्हारे लिए जेब में रखे हुए है शायद जो तुम्हें देने तो है लेकिन कैसे, कब, मालूम नहीं, डरता हूं तुमसे नहीं, अपने खुद के साए से। पर फिर सोचता हूं तुम कानों में उन्हें पहन कर जब घर से बाहर निकलोगे और कहीं मेरे सामने आ खड़े होगे और धीरे से अपने बालों को उंगलियों में लपेटकर कर शरमाते हुए कानों के पीछे करोगे, तब मैं वहीं स्तब्ध सा खड़ा होकर तुम्हें देखता रहूंगा, धड़कने थोड़ी रुक जाएंगी कुछ कहना चाहूंगा तुम्हें मगर कुछ बोल नहीं पाऊंगा। होंठ, जो पहले थोड़े कांपते से थे, अब तुम्हारे दुपट्टे क...

लंच बॉक्स

जब तुम टिफिन का डब्बा पैक करके मुझसे कहते हो घर जल्दी आना और फिर खुद ही वो टिफिन मेरे बैग के एक कोने में रख देती हो। भूल जाने की मेरी आदत पुरानी है, ये आदत भी तुम्हारी दी हुई है, भूलने के बाद तुम्हारी डांट खाना फिर तुम्हारे चेहरे पर वो फिक्र नजर आना नाराज़गी में छिपा तुम्हारा वो प्रेम मेरे मनाने पर तुम्हरा वो आंखें दिखाना मुझे भूल जाने पर मजबूर करती है। "सॉरी, कल से नहीं भूलूंगा" ये सुन कर तुम मुस्कुरा देती हो, तुम जानती हो कल फिर यही होगा कल मैं फिर कुछ भूलूंगा तुम फिर कल थोड़ा और प्यार शब्दों में कैद करके मुझपर आजाद कर दोगे। और ये सिलसिला यूंही दिन बा दिन चलता रहेगा उस दिन तक जब हम दोनों बैठे होंगे एक आराम कुर्सी पर जो हौले हौले ऊपर नीचे करेगी हमारी यादों की लहरों पर, और हम आंखें मूंदे देख रहे होंगे एक दूसरे को, लहरों पर नाचते हुए चलेंगे हाथ में हाथ थामे एक नए सफर पर दूसरे छोर तक। और वो टिफिन, किनारे पर फैली मखमली रेत पर पड़े एक संदूक के कोने में रखी होगी। इस इंतजार में कि फिर से कोई हम दोनों जैसा उस रेत पर एक आशियां बनाएगा, प्रेम का अंतरद्व...

आशा और अवधारणा के बीच का मन

 आंखें मूंद कर जब बैठते है कुछ लकीरें सी तैरने लगती है कभी ऊपर कभी नीचे  कभी लहरों सी नाचने लगती है कभी टिमटिमाती है, कभी शांत हो जाती है। हाथ की लकीरों की तरह नहीं है ये निष्ठुर, निर्मम, धारा सी स्थिर हर पल स्तब्ध करने वाली। चंचल होती है ये लकीरें, बिल्कुल मन की तरह। मन, जो ग्रसित होता है अवधारणाओं से, जो बंधा होता है आशाओं से। ये उन्हीं अवधारणाओं और आशाओं के बीच कि लकीरें है, जो उन्हें बांधे तो रखती है मगर करीब नहीं आने देती और इसी दायरे के बीच ये लकीरें  नाचती, मचलती, इठलाती है। ये दायरे कभी अथाह सागर जितने  तो कभी सांस और प्राण जितने होते है। मन भी इन्हीं दायरों के बीच भटकता है, जिंदगी ढूंढता है गम की छांव में सिमट जाता है खुशियों का आंचल लिए दौड़ता है थक कर उम्मीदों का आशियां बना सो जाता है। सपनों का पंख बनाता है, उड़ना चाहता है पर दायरों की जंजीर इसे बांधे रखती है। मन फिर लकीरों को पकड़ता है आजाद होना चाहता है उनके सहारे ऊपर नीचे  लहरों सा नाचता है। जब सब शांत हो जाता है, तो एक रौशनी सी नजर आती है, वो किरण पकड़ लेता है, अब मन आजाद है शांत, बिना किसी शोर के...

रात के सन्नाटे

सन्नाटे, लगते शांत है मगर चीखते बहुत है रात के सन्नाटे, सबसे ज्यादा आवाज़ करतें है सुनाई बिल्कुल नहीं देते पर कह इतना कुछ जाते है कि सुनने वाला एक रात में दो चार सदी की जिंदगी उधार मांग कर ले आता है। समुंदर में गोता लगा कर कभी मोती तो कभी कुछ गड़े मुर्दे निकाल लेता है मुर्दे, जिनका इस घड़ी कांटे से कोई मोल भाव नहीं है मगर फिर भी वो मिलों दूर फैली उस रेतेली सतह को जाने कैसे उथला कर देते है फिर पहुंच जाते है सतह पर तैरने लगते है अपना हाथ उठाते है पास बुलाते है सन्नाटे के साए में हम चुपके से एक अंगुली पकड़ लेते है फिर वो मुस्कुराते है और उस समंदर के उथले पानी में पहले एक लहर, फिर दूसरी फिर अलगे पल एक भंवर हम डूबते जाते है सन्नाटे के संग चीखते है जोर जोर से चिल्लाते है मगर वो सन्नाटे है सुनाई नहीं देते, रेतैली जमीन खींचती जाती है हम डूबते जाते है बूंदें कुछ साथ चलती है जो समुंदर के उस खारे पानी में कुछ और नमक घोलती जाती है अब सांस नहीं आती है वो तो सतह पर ही साथ छोर गई थी अब बूंद भी साथ नहीं है सब शांत हो चुका है एक और रात आदमी की शक्ल लिए उसी रेत ...

अतीत के पन्नों से

अतीत के पन्नों से निकल आज शायद तुम मुझे जगाने आए हो, नहीं, शायद झकझोरने आए हो, की मैं कहीं जेठ की दुपहरी सा सुनसान, सुन्न, शून्य सा सन्नाटे में खोया हुआ था, सोया हुआ था। नहीं, पर अब मैं तो मैं था ही नहीं शायद उसी दिन से जब तुम ख्वाबों में भी मेरे लिखे खतों का जवाब अपनी खामोशी से लिखने लगे थे वो खामोशी जो आज भी तुम्हारे नाम के ज़िक्र के साथ जिंदा होकर मेरे पास आती है और मुझे एक सन्नाटे में खींच ले जाती है। उस शून्य में जब मैं अपनी परछाई को तराशता हूं तो एक चेहरा उभर आता है जिसे ना तो तुम जान पाए ना कभी मैं पहचान पाया, चेहरा, जो आसमां में फैले अनगिनत सितारों की तरह अपनी चमक का एहसास तो दिलाता रहा मगर अमावस के चांद की रौशनी की तरह उसकी मौजूदगी का कभी अंदेशा तक नहीं हुआ। कभी कभी उस सन्नाटे में, एक तूफान भी उबासी लेता हुआ नींद से जाग जाता है, फिर यादों की नर्म हरी दूब पर सिर्फ तिनकों का एक ढेर बाकी रहता है। अबकी जब सिर्फ उस यादों के सुलगते, तड़पते ढेर में धुएं का एक गुबार बाकी सा है तो जहन में तुम्हारी उधार दी हुई तन्हा, तपिश से तर हुई चंद सांस लिए म...

तू इश्क़ नहीं मेरा मगर प्यार है तुझसे

तू इश्क़ नहीं मेरा, मगर मुझे प्यार है तुझसे तू चांद नहीं मेरा, मगर मेरी रौशनी है तुझसे तू आसमां भी नहीं मेरा, मगर मेरी हर छाव है तुझसे बेसब्री लिए खोजती है तुझे निगाहें मगर सब्र है कि तेरी परछाई से हाल पूछ लेते है माना मयस्सर तू नहीं है मेरे हिस्से मगर तेरी बातों कि एक किताब सी बुन लेते है सागर से मिलने का एक शौक़ है मुझे मगर मैं वो दरिया नहीं जो लहरों में समा सके माना तेरे बज़्म-ए-हयात में एक लम्हा भर ही हूं मगर उन लम्हों में ही कुछ सदियों सा जी लेता हूं तुझसे मुझसे कुछ यादें जुड़ी है घड़ियों को शाद करती कुछ बातें जुड़ी है कहे अनकहे कुछ अल्फ़ाज़ बिखरे से है मगर वो कलम वो कागज़ नहीं जिनमें समेट सके इनको साज है आवाज़ है, मगर परवाज़ नहीं तू आइना है मेरा, मगर मेरा वजूद नहीं तुझसे तू आदत नहीं मेरी, मगर मेरी ज़रूरत है तुझसे तू इश्क़ नहीं मेरा, मगर मुझे प्यार है तुझसे। Like our page on Facebook Follow us on Instagram

जीने कहां देती है

जीने कहां देती है! ख्वाहिशें एक तेरे संग जीने की एक तेरे बिन मर जाने की। सोने कहां देते हैं! ख्वाब एक तेरे पास आने का एक तुझसे दूर जाने का। रंगीन होने कहां देते है! रंग एक तुझमें भर जाने का एक तुझसे छीन लाने का। टूटती कहां है! उम्मीदें एक तेरे लौट आने की एक तुझे भूल जाने की। सुकून कहां आने देती हैं! यादें एक तेरे संग भीग जाने का एक तेरे बिन भीग जाने का। Like our page on Facebook Follow us on Instagram

मैं कुछ नहीं, मैं कोई नहीं

मैं कुछ नहीं, मैं कोई नहीं आरज़ू नहीं, कोई आबरू नहीं चमक नहीं, मैं फलक भी नहीं, दिल नहीं, मुझमें जां भी नहीं, साया नहीं, कोई साथी नहीं मैं कुछ नहीं, मैं कोई नहीं। सुबह नहीं, अब शाम नहीं सच नहीं ना कोई जूठ नई दिन भी वहीं रातें वहीं सांस वहीं, पर बातें नहीं मैं कुछ नहीं, मैं कोई नहीं। आगाज़ नहीं, अंज़ाम नहीं मैं शब्द नहीं कोई आवाज़ नहीं, किस्से नहीं, कहानी नहीं किरदार वही पर राज़ नहीं मैं कुछ नहीं मैं कोई नहीं। मैं गंगा नहीं, यमुना भी नहीं, पाप वही, अब पुण्य नहीं तीर्थ नहीं, कोई धाम नहीं पर्वत वही, पर हिमालय नहीं मैं कुछ नहीं, मैं कोई नहीं। दुश्मन नहीं पर दोस्त वही, मैं फिज़ा नहीं, रूत भी नहीं, अपना नहीं, ना गैर सही मंज़िल वही मैं रस्ता नहीं मैं कुछ नहीं मैं कोई नहीं। मैं पूरब नहीं पश्चिम नहीं सूरज वही, मैं दिशा नहीं मैं मिला नहीं, भटका भी नहीं आदमी वही कोई मुखौटा नहीं मैं कुछ नहीं, मैं कोई नहीं। Like our page on Facebook Follow us on Instagram

उम्मीद की, हौसलों की उड़ान

उड़ने दो मुझे, ये मेरी उड़ान है दस्तक देते पल नए ये मेरे आने वाले कल की सौगात है उम्मीद की ये मेरे हौसले की उड़ान है रोको नहीं कदमों को बढ़ने दो टोको नहीं अरमानों को बढ़ने दो सपनों ने अभी बस आंखे ही खोली है इनके पंखों को भी उड़ान भरने दो जरूरी नहीं हम दुनिया के बने बनाए आदर्शों पर ही चले हमें भी अपनी राह चुनने दो अभी से हमें बड़ा ना करो थोड़ा बचपन हममें अभी रहने दो इस भीड़ में एक दिन तो सबको खोना ही है अभी थोड़ा शोर को जीने दो छोटी छोटी मस्तियां और शरारतों कि ये मेरे लम्हों की यादों की उड़ान है उम्मीद की ये मेरे हौसलों की उड़ान है लपक सितारे ले आएंगे हम चांद पर भी हो आएंगे वक़्त की मशीन बना हम ब्रह्मांड के कोनों को भी नाप आएंगे बस हमारी सोच को साथ हमारे बढ़ने, मचलने और खेलने दो इसे भी साथ हमारे चलने दो। दुनिया में एब बहुत है तरक्की की राहें भी कम नहीं है मत बढ़ाओ हमें भी उन राहों पे बस एक अच्छा इंसान बनने दो। राह अपने आप बन जाएंगे जब कदम नहीं डगमगाएंगे हिमालय की चोटी पर जाकर अपना परचम हम लहराएंगे बस मेरे भी एहसासों को कुछ रंग नए भरने दो। गिरकर उठना...

दो दिल एक कहानी

मुझमें और तुममें काबिलियत है एक बहुत ख़ास दोस्त बनने की एक ऐसा दोस्त जो सिर्फ अपने नाम से नहीं, बल्कि एक दूसरे के नाम से पहचाने जाते है एक ऐसा दोस्त जो जिंदगी के हर धूप छांव में साथ खड़े रहते है हर तूफ़ान में भी चट्टान से डटे रहते है एक ऐसा हमकदम जो एकांत की उदासिओं को दोस्ती की चमक से रोशन कर देते है एक ऐसा साथी जो खुद भी ऊंचा उठता है और दूसरे का नाम भी फलक के दायरों में लिखता है। हां हममें काबिलियत है एक अदद दोस्त बनने की पर ये काबिलियत यूं ही नहीं है ये शायद तुम भी जानते हो। हमारे नाम अलग है पर सोच वही है बातें अलग है पर किस्से वही है हमारे जिस्म अलग है पर उनमें बसी रूह की तासीर वही है हमारी मंजिलें अलग है पर रास्ता वही कारवां भी वही है दिलों कि धड़कने अलग है पर उनके दायरों में बिखरी यादें वही है हम ख्वाबिदा नहीं है, पर ख्वाब एक से देखते है। राजदां भी नहीं है, मगर राज़ एक से रखते है। हममें काबिलियत है एक दूसरे को ऊंचा उठाने की अपनी मंजिलों को पास लाने की क्यूंकि हमारे बीच दिल, रूह और हस्ती को तोड़ने वाली इश्क़ की दीवार नहीं है हमारे बीच इकरार न...

अब तुमसे विदा लेता हूं

चलो तुम्हें आज़ाद करता हूं अपनी इस तन्हा जिंदगी से यूं तो तुम मेरे हुए नहीं कभी फिर भी जो ये एहसास कभी तुम्हारे नाम के थे आज इनसे विदा लेता हूं ये जो तुम्हारी बातें थीं जो कभी मेरे दिनों को यूं गुलज़ार करती थी तुम्हारी आहटें जो मुझे बेचैन कर देती थी कभी वो रूबरू होना तुमसे वो तुम्हारी यादों के साथ शाम से सहर होना तुम्हारे ही ख्वाबों के साथ हर रात हर राज़ बाटना अब इन सबसे भी विदा लेता हूं विदा लेता हूं कि अब लौट के वापस इन बायाबानो में फिर कदम नहीं लाऊंगा राब्ता तेरे नाम से जहां भी मैं पहचाना जाता था उन रास्तों से भी अब विदा लेता हूं चलता हूं कि हो सके तो याद रखना कभी तुम्हारी राहें बनाई थी कांटों को झेल कभी तुम्हें कलियों सा सजाया था तुम्हारी जिन्दगी तो नहीं बन सका पर याद रखना कि कम से कम एक ज़रिया भर ही था तुम्हारी तन्हाइयों, तुम्हारी ऊचाईयों का वक़्त बेवक्त वो दस्तक देती तुम्हारी हर बेचैनियों का। चलता हूं कि नए रास्ते अब पुकार रहे है जीने की जो थोड़ी लालसा दिल में दबी बची है वो आवाज़ दे बुला रहे है वो छोटे छोटे वक़्त के लम्हें जिनसे बुना उधरा ...

अगर कोई पूछे

अगर कोई तुमसे पूछे कौन हूं मैं कहना एक झोंका हवा का है रुख बदलने इन फिज़ाओं का जो दूर गुलिस्तां से आया है। अगर पूछे कोई तुमसे क्या हूं मैं कहना एक सिमटा लिबास है, जो ख़ामोशी की चादर में लिपटा अपने हिस्से की कहानियां बुन रहा है। अगर तुमसे कोई पूछे किस्से मेरे कहना अपने ही हालातों से टूटता बिखरता संवर के बनता हारा हुआ एक इंसान है। अगर कोई पूछ बैठे नाम मेरा कहना उसका नाम नहीं वजूद उसका उसकी कलम और आयतें उसकी पहचान है। अगर पूछे कोई क्या कर सकता हूं मैं कहना वो हर रूप इख्तियार हर काम मयस्सर कर सकता है खुशियां मुंतजर होती जिससे है। कभी कोई अगर पूछे कौन हो तुम कहना इस हयात-ए-सफर का एक हमसफ़र भर हूं राब्ता इतना ही है उससे की वो मेरे दिल को छूता है, मैं उसके कलमों में लिखी जाती हूं वो मेरी राहें बुनता है मैं उसे लड़खड़ाने से बचाती हूं शिकस्ता वो भी है, हस्सास मैं भी हूं चलना वो मुझे सिखाता है मैं जीना उसे सिखाती हूं। Like our page on Facebook

ग़ालिब की इबादत

ग़ालिब तुझे ख़ुदा मान बैठे है ये शायर भी खता खूब कर बैठे है तूने चंद बातें क्या कही दिल की तुझे ही दिल्लगी का देवता मान बैठे है दीवानगी की सौगातें क्या लिखी तूने तुझे दीवानों का मसीहा मान बैठे है इश्क़ की कलमे तूने खूब पढ़ी वाह वाही ये जमाने वाले लूट बैठे है इनायते तूने लिखी अपने इश्क़ की नाम इनपे हर आशिक़ लगा बैठे है चोट तो तूने भी खाई होगी गालिब दर्द तेरा दिल-ए-महरूम झेल बैठे है ग़ालिब तेरी बात और थी वो जमाने और थे दास्तानें और थी फ़लसफ़ा-ए-मोहब्बत की वो आफताबें और थी पर पन्नों पे इश्क़ लिखने वाले ये काफ़िर दिल में तेरी मूरत सजा बैठे है ग़ालिब तेरी इबादत खूब कर बैठे है ये शायर अब तुझे ख़ुदा मान बैठे है। Like our page on Facebook

शाम और उसकी याद

शामे मचल उठी है एक उसके ख्वाबों से दिन अभी डूबा ही है आसमां के किनारों से देखो चांद अभी निकला नहीं उसकी यादों का परवान मगर दिल में एक टीस लिए बैठा है, देखो चांद आ गया है आसमां में रात के दरिचों का दामन थामे उनका आना यूं तो मुमकिन नहीं लेकिन यादों की एक चिट्ठी भेजी है पढ़कर थोड़ी आहें भर लेना ये पैगाम भेजा है और इस चांद की ही तरह इन यादों के दामन में छुपकर ऐसे ही दरिचों के किनारे तकिए को मेरा कंधा बनाए इस रात की ख़ामोशी में खो जाना। सो जाना यूंही कि फिर हम ख्वाबों में मिलेंगे रात बाटेंगे जो दिल में तुम्हारे रह गई है उन बातों की एक चादर बनाएंगे ओढ़े उस चादर को दोनों साथ में ख्वाबों के सुनसान पड़े गलियारों को रौशन करेंगे करेंगे आबाद उन लम्हों को तुम्हारी आहों को बैचैन होती इन निग़ाहों को यूं सामने जो झिझक होती है तुम्हारी आंखों में ख्वाबों में उन पर्दों को हटा देना अपने दिल की कहना मेरे धड़कनों की सुनना जब बातों का कारवां थम जाए तो मेरी गोद में सर रख थोड़ी देर जुल्फों की छांव में बेचैनिओं को दम भरने देना बैठे रहेंगे कुछ देर यूहीं एक दूसरे का दामन था...

मेरी उम्मीद मेरी इबादत

मेरी उम्मीद वहीं तक है तेरा हौसला जहां तक मुझे राह दिखाता है। मेरी सादगी वहीं तक है तेरी संजीदगी जहां तक मुझे बेपरवाह बनाती है। मेरी चमक वहीं तक है तेरी चांदनी जहां तक इसे रोशनी दिखाती है। मेरी शराफत वहीं तक है तेरी हसी जहां तक इन्हें रास्ता दिखाती है। मेरे गीत वहीं तक है तेरे लफ्ज़ जहां तक इसके सुरों को सजाते है। मेरी शायरी वहीं तक है तेरे एहसास जहां तक इन्हें अल्फ़ाज़ बनाते है। मेरी सुबहें वहीं शाम भी वहीं तक है तेरा नाम जहां तक मेरे अज़ानों में सजते है। मेरी मंजिलें भी वहीं तक है तेरा रुतबा जहां तक मुझे ऊंचाईयां दिखाता है। और मेरी इबादतें भी वहीं तक है मेरे इश्क़ की बेनाम डगर जहां तुझे ख़ुदा बनाती है। Like our page on Facebook

शायद अब मेरी जरूरत नहीं

तुम्हें शायद मेरी अब जरूरत नहीं, या शायद हो भी, किसे पता तुमसे बेहतर तो ये कोई नहीं जान सकता फिर भी तुम्हारी ख़ामोशी ना चाहते हुए भी कुछ कह सी जाती है। तुम अपने आप में खोए रहते हो मैं भी चुपचाप तुम्हें देखता रहता हूं कोशिश करता हूं कि तुम्हारी ख़ामोशी को थोड़ा जान सकूं, पढ़ सकूं, समझ सकूं पर तुम्हें देख कर ठहर सा जाता हूं सोचता हूं शायद तुम कुछ कहोगे, पर कुछ आवाज़ सी आती नहीं फिर लगता है तुम्हारा हाल ही पूछ लूं इसी बहाने कुछ बात तो होगी, शायद तुम्हारी ख़ामोशी भी समझ जाऊंगा इसी बहाने थोड़ी जान पहचान भी बढ़ जाएगी तुम मुझको समझ पाओगे मैं भी शायद तुमको जान पाऊंगा पर तुम्हारे साथ ये ख़ामोशी भी आ जाती है, दीवार की तरह फिर लगता है शायद तुम्हें जरूरत नहीं किसी की या हो भी सकता है, ये मैं नहीं कह सकता सारा दिन इसी उधेड़बुन में निकल जाता है और बात वहीं आधी अधूरी सी रह जाती है मुझे तुम्हारे कुछ कहने का इंतजार रहता है शायद तुम्हें भी रहता होगा, पर कौन जाने ये शायद भी बहुत अजीब चीज़ है इसके चक्कर में जाने कितने बिछड़ जाते है और कितने बिखर जाते है पर ये शायद वही पड़ा रहता ह...

अगर तुम गलत ना समझो

अगर तुम गलत ना समझो तो एक बात कहूंगा तुम्हारे सहर को अपनी सुबह और सजर को अपनी शाम करूंगा दिल तो बचा नहीं खैर अब पर एक टुकड़ा तुम्हारे नाम करूंगा डरों नहीं तुमसे प्यार नहीं करूंगा बस तुम्हारे नाम को अपने नाम से एक अलग पहचान दूंगा हाथ नहीं थामुंगा तुम्हारा पर कदम दर कदम साथ चलूंगा तुम ठोकर खाओगे तो मैं भी गिरूंगा गिरना गलत नहीं है पर फिर उठकर मंजिल तुम्हारे नाम करूंगा अगर तुम गलत ना समझो तो एक बात कहूंगा अपनी खुशियों में से चंद तुम्हारे नाम करूंगा तुम्हारे गमों को अपने गम सा पहचान दूंगा तुम्हारी बेपरवाह मुस्कुराहट जिसे तुमने अपनी आंखों में छुपा दिया है उन्हें आजाद कर ये हसी अपने नाम करूंगा बेफिक्र रहो तुमसे इश्क़ नहीं करूंगा इकरार भी नहीं करूंगा, इज़हार भी नहीं करूंगा बस अपनी कलम से चंद आयाते तुम्हारे नाम लिखूंगा दरीचों के किनारे बैठ वक़्त बेवक्त तुमसे बात करूंगा कुछ अपनी कहूंगा कुछ तुम्हारी सुनूंगा बैठे रहेंगे एक दूसरे का दामन थामे पर तुम तुम ही रहोगे मैं भी मै ही रहूंगा इस पाक से रिश्ते को कोई नाम नहीं दूंगा अगर तुम गलत ना समझो तो फिर वही बात कहूंगा सह...

मेरी चाहत और कुछ पहलू

"पहला पहलू" मेरी चाहत के हिसाब से अगर बात होती तो ये कायनात, सारी कायनात मेरे साथ होती। मेरे दिल के हिसाब से अगर बात होती तो ये जुनून, सारा जुनून मेरे साथ होता जो मेरी आंखो के हिसाब से अगर बात होती तो ये नूर, आंखो का हर नूर मेरे साथ होता मेरे हाथों के हिसाब से अगर बात होती तो ये साथ और हाथों में मेरा हाथ होता मेरे कदमों के हिसाब से अगर बात होती तो हर मंजिल, दुनिया की हर मंजिल साथ होती जो मेरे इश्क़ के हिसाब से अगर बात होती तो ये जिंदगी, सारी जिंदगी बस तेरे नाम होती "दूसरा पहलू" मगर ऐसा हो ना सका अब ये आलम है कि कायनात नहीं, जुनून नहीं आंखों का नूर भी नहीं तेरा साथ और हाथों में हाथ नहीं दुनिया की वो मंजिलें भी नहीं जिंदगी है मगर तेरे नाम की नहीं सांसें भी है मगर वो एहसास नहीं खालीपन है कुछ यहां धड़कता सा है पर दिल नहीं "तीसरा पहलू" खैर यूं एक दिन चाहत भी मेरे हिसाब की होगी, बातें भी बस मेरे नाम की होगी दिल में जो थोड़ी है जुरअतें, उनसे अपनी पहचान बना बिखरूंगी, सवरूंगी, उरूंगी भी अरमानों ने जो मिटा दी धुंध की चादरें आंखों ...

कौन हो तुम, कौन हूं मैं

कौन हो तुम, कौन हूं मैं एक चेहरा ही तो है एक दिल भी है शायद टूटा हुआ सा, बिखरा हुआ सा हमेशा से ऐसा नहीं था मगर तुम्हारे अपने किस्से थे मेरी अपनी कहानियां थी दिल के हिस्से अपनी अपनी निशानियां थी मौजे थी, लहरें थी समुंदर के किनारे भी थे रेत पर पांवाे के निशा बनाते तुम भी थे मैं भी था फिर कुछ लहरें तेज अाई लौटते हुए के गई अपने साथ उन पांवो के निशानों को अब किनारों पर तन्हा खड़े तुम भी थे, मैं भी था फिर तुम राह अपनी चल दिए मैं डगर अपनी ढूंढने लगा अपनी अपनी कहानियां दिलो में लिए जब अचानक टकरा गए बीच राह में एक दिन तो दिल को एहसास हुआ तुम भी वही हो मैं भी वही चेहरा भले अलग अलग है पर दिलों की दास्तां, वो किस्से कहानियां दिलों में बसी अपनी अपनी निशानियां सब वही तो है नाम अलग है पर एहसास वही है फिर भी दोनों पूछ बैठे यूहीं कौन हो तुम, कौन हूं मैं एक आवाज़ अाई एक चेहरा ही है बस अपनी बीती हुई कहानियों का और आने वाली ऊंचाइयों का पर कल जब कोई पूछ बैठेगा कौन हो तुम, कौन हूं मैं तो ये जवाब मिलेगा एक चेहरा भी है, एक नाम भी है अपनी दुनिया से अलग एक पहचान भी है ...

खामोशियां - एक आवाज़

खामोशियां एक आवाज़ है, खामोशियां एक अल्फ़ाज़ है खामोशियां एक साज़ है जिसकी धुन पे नाचती रात है खामोशियां एक राज़ है सन्नाटे सुनने को जिसे बेताब है खामोशियां यादों की एक बूंद है ओस से लिपटी जिसकी हर सुबह और वही अकेली शाम है। Like our page on Facebook