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शाम और उसकी याद

शामे मचल उठी है
एक उसके ख्वाबों से
दिन अभी डूबा ही है
आसमां के किनारों से
देखो चांद अभी निकला नहीं
उसकी यादों का परवान मगर
दिल में एक टीस लिए बैठा है,
देखो चांद आ गया है आसमां में
रात के दरिचों का दामन थामे
उनका आना यूं तो मुमकिन नहीं
लेकिन यादों की एक चिट्ठी भेजी है
पढ़कर थोड़ी आहें भर लेना
ये पैगाम भेजा है
और इस चांद की ही तरह
इन यादों के दामन में छुपकर
ऐसे ही दरिचों के किनारे
तकिए को मेरा कंधा बनाए
इस रात की ख़ामोशी में खो जाना।

सो जाना यूंही कि फिर हम
ख्वाबों में मिलेंगे रात बाटेंगे
जो दिल में तुम्हारे रह गई है
उन बातों की एक चादर बनाएंगे
ओढ़े उस चादर को दोनों
साथ में ख्वाबों के सुनसान पड़े
गलियारों को रौशन करेंगे
करेंगे आबाद उन लम्हों को
तुम्हारी आहों को
बैचैन होती इन निग़ाहों को
यूं सामने जो झिझक होती है
तुम्हारी आंखों में
ख्वाबों में उन पर्दों को हटा देना
अपने दिल की कहना
मेरे धड़कनों की सुनना
जब बातों का कारवां थम जाए
तो मेरी गोद में सर रख
थोड़ी देर जुल्फों की छांव में
बेचैनिओं को दम भरने देना
बैठे रहेंगे कुछ देर यूहीं
एक दूसरे का दामन थामे
खामोश पड़ी इन फिज़ाओं में
करेंगे गुलज़ार उन घरौंदो को
एक नए सहर के इंतजार में
फिर से मचलती शाम के कारवां में
और कल फिर दस्तक देते ख्वाब में।


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Comments

  1. Kya samaa bandhaa h ustad ji.. Wah wah... Wah wah...

    Kissi khaas ko yaad karne ka agar koi vakayee mein mukkammal tareeka h toh Woh yahi h.. yahi h...

    ReplyDelete

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