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Showing posts with the label Dil Ki Baat

कुछ कहना है तुमसे

सुनो, कुछ कहना है तुमसे क्या, कैसे, कब, नहीं पता मगर फिर भी कुछ कहना है तुमसे। शब्द नहीं है, होंठ भी कुछ कांपते से है मन भी आशंकित सा हुआ जाता है बोलना बहुत कुछ है इसे मगर कहने से डरता भी बहुत है। शायद कुछ उलझा सा हुआ है तुम्हें तुमसा देख कर ये मन, शब्दों में अथाह सागर के बीच भी अतृप्त, आवाक, विचलित रह जाता है वो डूबना चाहता है, तैरना भी पर वो सागर कदम पड़ते ही रेत हुआ जाता है क्यों, कैसे कुछ मालूम नहीं। फिर भी कुछ कहना है तुमसे, मुझे झुमके बहुत पसंद है बाज़ार से खरीदे थे, तुम्हारे लिए जेब में रखे हुए है शायद जो तुम्हें देने तो है लेकिन कैसे, कब, मालूम नहीं, डरता हूं तुमसे नहीं, अपने खुद के साए से। पर फिर सोचता हूं तुम कानों में उन्हें पहन कर जब घर से बाहर निकलोगे और कहीं मेरे सामने आ खड़े होगे और धीरे से अपने बालों को उंगलियों में लपेटकर कर शरमाते हुए कानों के पीछे करोगे, तब मैं वहीं स्तब्ध सा खड़ा होकर तुम्हें देखता रहूंगा, धड़कने थोड़ी रुक जाएंगी कुछ कहना चाहूंगा तुम्हें मगर कुछ बोल नहीं पाऊंगा। होंठ, जो पहले थोड़े कांपते से थे, अब तुम्हारे दुपट्टे क...

लंच बॉक्स

जब तुम टिफिन का डब्बा पैक करके मुझसे कहते हो घर जल्दी आना और फिर खुद ही वो टिफिन मेरे बैग के एक कोने में रख देती हो। भूल जाने की मेरी आदत पुरानी है, ये आदत भी तुम्हारी दी हुई है, भूलने के बाद तुम्हारी डांट खाना फिर तुम्हारे चेहरे पर वो फिक्र नजर आना नाराज़गी में छिपा तुम्हारा वो प्रेम मेरे मनाने पर तुम्हरा वो आंखें दिखाना मुझे भूल जाने पर मजबूर करती है। "सॉरी, कल से नहीं भूलूंगा" ये सुन कर तुम मुस्कुरा देती हो, तुम जानती हो कल फिर यही होगा कल मैं फिर कुछ भूलूंगा तुम फिर कल थोड़ा और प्यार शब्दों में कैद करके मुझपर आजाद कर दोगे। और ये सिलसिला यूंही दिन बा दिन चलता रहेगा उस दिन तक जब हम दोनों बैठे होंगे एक आराम कुर्सी पर जो हौले हौले ऊपर नीचे करेगी हमारी यादों की लहरों पर, और हम आंखें मूंदे देख रहे होंगे एक दूसरे को, लहरों पर नाचते हुए चलेंगे हाथ में हाथ थामे एक नए सफर पर दूसरे छोर तक। और वो टिफिन, किनारे पर फैली मखमली रेत पर पड़े एक संदूक के कोने में रखी होगी। इस इंतजार में कि फिर से कोई हम दोनों जैसा उस रेत पर एक आशियां बनाएगा, प्रेम का अंतरद्व...

आशा और अवधारणा के बीच का मन

 आंखें मूंद कर जब बैठते है कुछ लकीरें सी तैरने लगती है कभी ऊपर कभी नीचे  कभी लहरों सी नाचने लगती है कभी टिमटिमाती है, कभी शांत हो जाती है। हाथ की लकीरों की तरह नहीं है ये निष्ठुर, निर्मम, धारा सी स्थिर हर पल स्तब्ध करने वाली। चंचल होती है ये लकीरें, बिल्कुल मन की तरह। मन, जो ग्रसित होता है अवधारणाओं से, जो बंधा होता है आशाओं से। ये उन्हीं अवधारणाओं और आशाओं के बीच कि लकीरें है, जो उन्हें बांधे तो रखती है मगर करीब नहीं आने देती और इसी दायरे के बीच ये लकीरें  नाचती, मचलती, इठलाती है। ये दायरे कभी अथाह सागर जितने  तो कभी सांस और प्राण जितने होते है। मन भी इन्हीं दायरों के बीच भटकता है, जिंदगी ढूंढता है गम की छांव में सिमट जाता है खुशियों का आंचल लिए दौड़ता है थक कर उम्मीदों का आशियां बना सो जाता है। सपनों का पंख बनाता है, उड़ना चाहता है पर दायरों की जंजीर इसे बांधे रखती है। मन फिर लकीरों को पकड़ता है आजाद होना चाहता है उनके सहारे ऊपर नीचे  लहरों सा नाचता है। जब सब शांत हो जाता है, तो एक रौशनी सी नजर आती है, वो किरण पकड़ लेता है, अब मन आजाद है शांत, बिना किसी शोर के...

रात के सन्नाटे

सन्नाटे, लगते शांत है मगर चीखते बहुत है रात के सन्नाटे, सबसे ज्यादा आवाज़ करतें है सुनाई बिल्कुल नहीं देते पर कह इतना कुछ जाते है कि सुनने वाला एक रात में दो चार सदी की जिंदगी उधार मांग कर ले आता है। समुंदर में गोता लगा कर कभी मोती तो कभी कुछ गड़े मुर्दे निकाल लेता है मुर्दे, जिनका इस घड़ी कांटे से कोई मोल भाव नहीं है मगर फिर भी वो मिलों दूर फैली उस रेतेली सतह को जाने कैसे उथला कर देते है फिर पहुंच जाते है सतह पर तैरने लगते है अपना हाथ उठाते है पास बुलाते है सन्नाटे के साए में हम चुपके से एक अंगुली पकड़ लेते है फिर वो मुस्कुराते है और उस समंदर के उथले पानी में पहले एक लहर, फिर दूसरी फिर अलगे पल एक भंवर हम डूबते जाते है सन्नाटे के संग चीखते है जोर जोर से चिल्लाते है मगर वो सन्नाटे है सुनाई नहीं देते, रेतैली जमीन खींचती जाती है हम डूबते जाते है बूंदें कुछ साथ चलती है जो समुंदर के उस खारे पानी में कुछ और नमक घोलती जाती है अब सांस नहीं आती है वो तो सतह पर ही साथ छोर गई थी अब बूंद भी साथ नहीं है सब शांत हो चुका है एक और रात आदमी की शक्ल लिए उसी रेत ...

राजा, प्रजा और किस्सा कुर्सी का

"तुम इस नगर के राजा हो, ये प्रजा तुम्हारी है, तुम्हारे नगर में क्या कुछ हो रहा है इसकी पूर्ण जानकारी तुम्हें होनी चाहिए, राजा को अपने नगर में होने वाली हर गतिविधि पर नज़रें गड़ा कर रखनी चाहिए।" यह सुनते ही मैं खुशी से उछल पड़ा, अरे हां मैं तो राजा हूं, ये मेरी ही तो प्रजा है, ये नगर भी मेरा है, यहां होने वाली हर घटना मेरी नज़रों के समक्ष होनी चाहिए। क्या खूब कही, मुझमें भी शक्तियां है, मैं भी आदेश से सकता हूं, मेरे हर आदेश का पालन करना प्रजा के लिए अनिवार्य है। मैं बुरा बिल्कुल भी नहीं हूं तो कोई ग़लत आदेश या बिना वजह प्रजा को परेशान करना मेरा लक्ष्य नहीं है, मैं तो हर कार्य में अपनी और सबकी भलाई देखता हूं। लेकिन फिर भी राजा होने का आभास अपने आप में अनोखा है। मैं खुद को बहुत ताकतवर समझने लगा था, खुद को सबसे ऊपर देख पा रहा था। ये उल्लास के क्षण थे और मैं इसी उल्लास के आवेश में कुर्सी पर विराजमान हो गया। तभी एक आवाज़ ने मुझे उस क्षणिक आवेश से बाहर निकाला। "अच्छा तो राजा जी थोड़ा बाहर निकल के देखें और पता करें की ये व्यक्ति कहा गायब हो गया है। अभी तो यहीं पर था लेकिन अ...

अतीत के पन्नों से

अतीत के पन्नों से निकल आज शायद तुम मुझे जगाने आए हो, नहीं, शायद झकझोरने आए हो, की मैं कहीं जेठ की दुपहरी सा सुनसान, सुन्न, शून्य सा सन्नाटे में खोया हुआ था, सोया हुआ था। नहीं, पर अब मैं तो मैं था ही नहीं शायद उसी दिन से जब तुम ख्वाबों में भी मेरे लिखे खतों का जवाब अपनी खामोशी से लिखने लगे थे वो खामोशी जो आज भी तुम्हारे नाम के ज़िक्र के साथ जिंदा होकर मेरे पास आती है और मुझे एक सन्नाटे में खींच ले जाती है। उस शून्य में जब मैं अपनी परछाई को तराशता हूं तो एक चेहरा उभर आता है जिसे ना तो तुम जान पाए ना कभी मैं पहचान पाया, चेहरा, जो आसमां में फैले अनगिनत सितारों की तरह अपनी चमक का एहसास तो दिलाता रहा मगर अमावस के चांद की रौशनी की तरह उसकी मौजूदगी का कभी अंदेशा तक नहीं हुआ। कभी कभी उस सन्नाटे में, एक तूफान भी उबासी लेता हुआ नींद से जाग जाता है, फिर यादों की नर्म हरी दूब पर सिर्फ तिनकों का एक ढेर बाकी रहता है। अबकी जब सिर्फ उस यादों के सुलगते, तड़पते ढेर में धुएं का एक गुबार बाकी सा है तो जहन में तुम्हारी उधार दी हुई तन्हा, तपिश से तर हुई चंद सांस लिए म...

जीने कहां देती है

जीने कहां देती है! ख्वाहिशें एक तेरे संग जीने की एक तेरे बिन मर जाने की। सोने कहां देते हैं! ख्वाब एक तेरे पास आने का एक तुझसे दूर जाने का। रंगीन होने कहां देते है! रंग एक तुझमें भर जाने का एक तुझसे छीन लाने का। टूटती कहां है! उम्मीदें एक तेरे लौट आने की एक तुझे भूल जाने की। सुकून कहां आने देती हैं! यादें एक तेरे संग भीग जाने का एक तेरे बिन भीग जाने का। Like our page on Facebook Follow us on Instagram

मेरी चाहत और कुछ पहलू

"पहला पहलू" मेरी चाहत के हिसाब से अगर बात होती तो ये कायनात, सारी कायनात मेरे साथ होती। मेरे दिल के हिसाब से अगर बात होती तो ये जुनून, सारा जुनून मेरे साथ होता जो मेरी आंखो के हिसाब से अगर बात होती तो ये नूर, आंखो का हर नूर मेरे साथ होता मेरे हाथों के हिसाब से अगर बात होती तो ये साथ और हाथों में मेरा हाथ होता मेरे कदमों के हिसाब से अगर बात होती तो हर मंजिल, दुनिया की हर मंजिल साथ होती जो मेरे इश्क़ के हिसाब से अगर बात होती तो ये जिंदगी, सारी जिंदगी बस तेरे नाम होती "दूसरा पहलू" मगर ऐसा हो ना सका अब ये आलम है कि कायनात नहीं, जुनून नहीं आंखों का नूर भी नहीं तेरा साथ और हाथों में हाथ नहीं दुनिया की वो मंजिलें भी नहीं जिंदगी है मगर तेरे नाम की नहीं सांसें भी है मगर वो एहसास नहीं खालीपन है कुछ यहां धड़कता सा है पर दिल नहीं "तीसरा पहलू" खैर यूं एक दिन चाहत भी मेरे हिसाब की होगी, बातें भी बस मेरे नाम की होगी दिल में जो थोड़ी है जुरअतें, उनसे अपनी पहचान बना बिखरूंगी, सवरूंगी, उरूंगी भी अरमानों ने जो मिटा दी धुंध की चादरें आंखों ...