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रात के सन्नाटे

सन्नाटे, लगते शांत है
मगर चीखते बहुत है
रात के सन्नाटे,
सबसे ज्यादा आवाज़ करतें है
सुनाई बिल्कुल नहीं देते
पर कह इतना कुछ जाते है कि
सुनने वाला एक रात में
दो चार सदी की जिंदगी
उधार मांग कर ले आता है।
समुंदर में गोता लगा कर
कभी मोती तो कभी कुछ गड़े मुर्दे
निकाल लेता है
मुर्दे, जिनका इस घड़ी कांटे से
कोई मोल भाव नहीं है
मगर फिर भी वो मिलों दूर फैली
उस रेतेली सतह को जाने कैसे
उथला कर देते है
फिर पहुंच जाते है सतह पर
तैरने लगते है
अपना हाथ उठाते है पास बुलाते है
सन्नाटे के साए में हम
चुपके से एक अंगुली पकड़ लेते है
फिर वो मुस्कुराते है
और उस समंदर के उथले पानी में
पहले एक लहर, फिर दूसरी
फिर अलगे पल एक भंवर
हम डूबते जाते है
सन्नाटे के संग चीखते है
जोर जोर से चिल्लाते है
मगर वो सन्नाटे है
सुनाई नहीं देते,
रेतैली जमीन खींचती जाती है
हम डूबते जाते है
बूंदें कुछ साथ चलती है
जो समुंदर के उस खारे पानी में
कुछ और नमक घोलती जाती है
अब सांस नहीं आती है
वो तो सतह पर ही साथ छोर गई थी
अब बूंद भी साथ नहीं है
सब शांत हो चुका है
एक और रात
आदमी की शक्ल लिए
उसी रेत में फिर दफन हो जाता है
अगली रात में फिर से
मुर्दा बनकर जिंदा होने के लिए
सन्नाटे अब शांत हो गए है
अब ना आदमी का शोर है
ना ही सन्नाटे का
शायद भोर होने को है
सुबह के सन्नाटे आवाज़ नहीं करते।

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