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अतीत के पन्नों से

अतीत के पन्नों से निकल आज
शायद तुम मुझे जगाने आए हो,
नहीं, शायद झकझोरने आए हो,
की मैं कहीं जेठ की दुपहरी सा
सुनसान, सुन्न, शून्य सा सन्नाटे में
खोया हुआ था, सोया हुआ था।

नहीं, पर अब मैं तो मैं था ही नहीं
शायद उसी दिन से
जब तुम ख्वाबों में भी
मेरे लिखे खतों का जवाब
अपनी खामोशी से लिखने लगे थे
वो खामोशी जो आज भी
तुम्हारे नाम के ज़िक्र के साथ
जिंदा होकर मेरे पास आती है
और मुझे एक सन्नाटे में खींच ले जाती है।

उस शून्य में जब मैं
अपनी परछाई को तराशता हूं तो
एक चेहरा उभर आता है
जिसे ना तो तुम जान पाए
ना कभी मैं पहचान पाया,
चेहरा, जो आसमां में फैले
अनगिनत सितारों की तरह
अपनी चमक का एहसास तो दिलाता रहा
मगर अमावस के चांद की
रौशनी की तरह उसकी मौजूदगी का
कभी अंदेशा तक नहीं हुआ।

कभी कभी उस सन्नाटे में,
एक तूफान भी उबासी लेता हुआ
नींद से जाग जाता है,
फिर यादों की नर्म हरी दूब पर
सिर्फ तिनकों का एक ढेर बाकी रहता है।

अबकी जब सिर्फ उस यादों के
सुलगते, तड़पते ढेर में
धुएं का एक गुबार बाकी सा है
तो जहन में तुम्हारी उधार दी हुई
तन्हा, तपिश से तर हुई चंद सांस लिए
मुखालिफ दायरों में कैद ये दिल
वो बेज़ार चेहरा ढूंढने की
हजारों नाकाम कोशिशें करता है
और थक कर अपने ही आगोश में सिमटकर
उस अतीत को चादर बना
सुनसान, सुन्न, शून्य सा सन्नाटे में कहीं
खो जाता है सो जाता है।

©

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