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मेरी उम्मीद मेरी इबादत

मेरी उम्मीद वहीं तक है
तेरा हौसला जहां तक मुझे राह दिखाता है।
मेरी सादगी वहीं तक है
तेरी संजीदगी जहां तक मुझे बेपरवाह बनाती है।
मेरी चमक वहीं तक है
तेरी चांदनी जहां तक इसे रोशनी दिखाती है।
मेरी शराफत वहीं तक है
तेरी हसी जहां तक इन्हें रास्ता दिखाती है।
मेरे गीत वहीं तक है
तेरे लफ्ज़ जहां तक इसके सुरों को सजाते है।
मेरी शायरी वहीं तक है
तेरे एहसास जहां तक इन्हें अल्फ़ाज़ बनाते है।
मेरी सुबहें वहीं शाम भी वहीं तक है
तेरा नाम जहां तक मेरे अज़ानों में सजते है।
मेरी मंजिलें भी वहीं तक है
तेरा रुतबा जहां तक मुझे ऊंचाईयां दिखाता है।
और मेरी इबादतें भी वहीं तक है
मेरे इश्क़ की बेनाम डगर जहां तुझे ख़ुदा बनाती है।

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परिकल्पना - सफ़र जिंदगी का

हम एक जीवन की कल्पना करते है फिर उस परिकल्पना में रंग भरते है कुछ छोटी कुछ बड़ी आशाएं, कुछ यादें, कुछ बातें, लम्हों कि सौगातें कुछ आकांक्षायें पहलू में समेट लेते है कुछ बस एक काश में ही सिमट जाते है कुछ जिरह, कुछ विरह, कुछ जद्दोजेहद सब मिल कर स्याह बनकर कोरे पन्नों पर कुछ लिखना चाहते है, किरदार सजते है, कुछ किस्से संवरते है कुछ दाग बनकर वहीं रह जाते है। हम खुशियां समेटते है सन्नाटे छाटते है चलते है, भागते है, हांफते है, थक कर दहलीज पर बैठ जाते है सांस लेने की कवायद करते है, लड़ते है एक उम्मीद लिए आसमां में तैरते है एक तिनका पकड़ते है चांद पर बैठ जाते है कभी बादलों से उलझकर गिर जाते है और सागर की गहराइयों में खो जाते है उस शून्य में रंग सारे सफेद हो जाते है पीछे बचती है एक लकीर काले स्याह रंग की, अंधकार समेटे जो जमीं को आसमां से जोड़ती है यादों की बारिश उस लकीर को सिंचती है कुछ टहनियों को जन्म देती है जो एक आखरी सफर को छाव देते है हम चलते जाते है, अकेले उस सफर पर और कल्पनाएं, जिनमें कुछ रंग भरे थे फूल बनकर बिखरते जाते है कांटे जो पावों में छुपे थे, चुभे थे ...

मैं कुछ नहीं, मैं कोई नहीं

मैं कुछ नहीं, मैं कोई नहीं आरज़ू नहीं, कोई आबरू नहीं चमक नहीं, मैं फलक भी नहीं, दिल नहीं, मुझमें जां भी नहीं, साया नहीं, कोई साथी नहीं मैं कुछ नहीं, मैं कोई नहीं। सुबह नहीं, अब शाम नहीं सच नहीं ना कोई जूठ नई दिन भी वहीं रातें वहीं सांस वहीं, पर बातें नहीं मैं कुछ नहीं, मैं कोई नहीं। आगाज़ नहीं, अंज़ाम नहीं मैं शब्द नहीं कोई आवाज़ नहीं, किस्से नहीं, कहानी नहीं किरदार वही पर राज़ नहीं मैं कुछ नहीं मैं कोई नहीं। मैं गंगा नहीं, यमुना भी नहीं, पाप वही, अब पुण्य नहीं तीर्थ नहीं, कोई धाम नहीं पर्वत वही, पर हिमालय नहीं मैं कुछ नहीं, मैं कोई नहीं। दुश्मन नहीं पर दोस्त वही, मैं फिज़ा नहीं, रूत भी नहीं, अपना नहीं, ना गैर सही मंज़िल वही मैं रस्ता नहीं मैं कुछ नहीं मैं कोई नहीं। मैं पूरब नहीं पश्चिम नहीं सूरज वही, मैं दिशा नहीं मैं मिला नहीं, भटका भी नहीं आदमी वही कोई मुखौटा नहीं मैं कुछ नहीं, मैं कोई नहीं। Like our page on Facebook Follow us on Instagram

नींव और रिश्तों के मायने

नींव क्या है? इसका वजूद क्या है? क्या महत्व है इसका? इसका अपने जीवन में क्या मायने है? देखने में तो बहुत ही छोटी चीज़ लगती है लेकिन जितनी छोटी है उतनी ही ज़रूरी भी है। इस नींव के बहुत रूप है, और सबके अपने अपने नजरिए है इसे देखने के, हमने भी एक छोटी से कोशिश की है इसे समझने की और इसे एक अपना रूप देने की। एक घर की मज़बूती उसकी नींव ही तय करती है, बिना एक मज़बूत नींव के एक सुदृढ़ घर की कल्पना करना ही बेकार है। एक बड़ी इमारत के बनने में सबसे ज्यादा वक़्त उसकी नींव तैयार करने में लगता है क्यूंकि बिना एक मजबूत नींव के इमारत खड़ी होना ही नामुमकिन है और अगर किसी तरह खड़ी भी हो गई तो आज नहीं तो कल उसका गिरना तय ही है। ठीक इसी तरह एक मजबूत रिश्ते के लिए उतनी ही मजबूत नींव की ज़रूरत होती है। कैसा भी रिश्ता हो अगर उसकी बुनियाद खोखली और नींव कमज़ोर है तो वो कभी एक सुनहरी सुबह नहीं देख पाती। ऐसे रिश्ते बस पूस के बादल की तरह होते है, दिखावटी, बिना पानी की एक भी बूंद के, बस वहां होने भर का एहसास कराती है लेकिन उनके पास देने को कुछ नहीं होता। रिश्ता चाहे प्यार का हो, दोस्ती का हो, भाई बहन का हो, मा...