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ग़ालिब की इबादत

ग़ालिब तुझे ख़ुदा मान बैठे है
ये शायर भी खता खूब कर बैठे है
तूने चंद बातें क्या कही दिल की
तुझे ही दिल्लगी का देवता मान बैठे है
दीवानगी की सौगातें क्या लिखी तूने
तुझे दीवानों का मसीहा मान बैठे है
इश्क़ की कलमे तूने खूब पढ़ी
वाह वाही ये जमाने वाले लूट बैठे है
इनायते तूने लिखी अपने इश्क़ की
नाम इनपे हर आशिक़ लगा बैठे है
चोट तो तूने भी खाई होगी गालिब
दर्द तेरा दिल-ए-महरूम झेल बैठे है
ग़ालिब तेरी बात और थी
वो जमाने और थे दास्तानें और थी
फ़लसफ़ा-ए-मोहब्बत की वो आफताबें और थी
पर पन्नों पे इश्क़ लिखने वाले ये काफ़िर
दिल में तेरी मूरत सजा बैठे है
ग़ालिब तेरी इबादत खूब कर बैठे है
ये शायर अब तुझे ख़ुदा मान बैठे है।


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