Skip to main content

Posts

जीने कहां देती है

जीने कहां देती है! ख्वाहिशें एक तेरे संग जीने की एक तेरे बिन मर जाने की। सोने कहां देते हैं! ख्वाब एक तेरे पास आने का एक तुझसे दूर जाने का। रंगीन होने कहां देते है! रंग एक तुझमें भर जाने का एक तुझसे छीन लाने का। टूटती कहां है! उम्मीदें एक तेरे लौट आने की एक तुझे भूल जाने की। सुकून कहां आने देती हैं! यादें एक तेरे संग भीग जाने का एक तेरे बिन भीग जाने का। Like our page on Facebook Follow us on Instagram

एक चिट्ठी अज़ीज़ दोस्त के नाम

मेरे अज़ीज़ दोस्त, मेरे हमकदम, मेरे राजदां। कहते है कि खुदा ने अपनी कमी हर जगह पूरी करने के लिए रिश्तों को बनाया उन्हें हर रंग से सजाया, और इन सभी रिश्तों में दोस्ती को सबसे ख़ास बनाया, इतना ख़ास कि खुद भगवान भी इसे अपने सबसे करीब रखा, फिर चाहे वो राधा रानी हो या फिर सुदामा। खैर मैं अपने आप की तुलना भगवान से तो भूल कर भी नहीं कर सकता, लेकिन मेरे लिए भी दोस्ती का रंग रूप वही है जो उनके लिए था। इस पाक रिश्ते के मायने वही है, इनमें बसा प्यार और एहसास वही है जो भगवान ने राधा और सुदामा में देखा था। तुम सोच रहे होगे हम तो रोज़ ही मिलते और बातें करते है तो फिर ये चिट्ठी तुम्हारे नाम क्यों। चिट्ठियों का भी अपना एक अलग एहसास और मर्म है, जो शायद बातें भी बयां नहीं कर सकती, और फिर ये चिट्ठी हर उन पलों के लिए है जब शायद, शायद किसी वजह से मैं तुम्हारे पास नहीं पहुंच पाऊ, और हर उन पलों में जब तुम मुझे याद करना चाहो अपने पहलू में अपने अंदाज में। ये चिट्ठी हमारे एहसासों को हमारे अंदर हमेशा जिंदा रखेगा, उस उम्मीद को जिंदा रखेगा की तुम्हारे लिए एक रूह हमेशा तुम्हारे पीछे खड़ा है तुम्हें ऊंचा उठाए र...

मैं कुछ नहीं, मैं कोई नहीं

मैं कुछ नहीं, मैं कोई नहीं आरज़ू नहीं, कोई आबरू नहीं चमक नहीं, मैं फलक भी नहीं, दिल नहीं, मुझमें जां भी नहीं, साया नहीं, कोई साथी नहीं मैं कुछ नहीं, मैं कोई नहीं। सुबह नहीं, अब शाम नहीं सच नहीं ना कोई जूठ नई दिन भी वहीं रातें वहीं सांस वहीं, पर बातें नहीं मैं कुछ नहीं, मैं कोई नहीं। आगाज़ नहीं, अंज़ाम नहीं मैं शब्द नहीं कोई आवाज़ नहीं, किस्से नहीं, कहानी नहीं किरदार वही पर राज़ नहीं मैं कुछ नहीं मैं कोई नहीं। मैं गंगा नहीं, यमुना भी नहीं, पाप वही, अब पुण्य नहीं तीर्थ नहीं, कोई धाम नहीं पर्वत वही, पर हिमालय नहीं मैं कुछ नहीं, मैं कोई नहीं। दुश्मन नहीं पर दोस्त वही, मैं फिज़ा नहीं, रूत भी नहीं, अपना नहीं, ना गैर सही मंज़िल वही मैं रस्ता नहीं मैं कुछ नहीं मैं कोई नहीं। मैं पूरब नहीं पश्चिम नहीं सूरज वही, मैं दिशा नहीं मैं मिला नहीं, भटका भी नहीं आदमी वही कोई मुखौटा नहीं मैं कुछ नहीं, मैं कोई नहीं। Like our page on Facebook Follow us on Instagram

नींव और रिश्तों के मायने

नींव क्या है? इसका वजूद क्या है? क्या महत्व है इसका? इसका अपने जीवन में क्या मायने है? देखने में तो बहुत ही छोटी चीज़ लगती है लेकिन जितनी छोटी है उतनी ही ज़रूरी भी है। इस नींव के बहुत रूप है, और सबके अपने अपने नजरिए है इसे देखने के, हमने भी एक छोटी से कोशिश की है इसे समझने की और इसे एक अपना रूप देने की। एक घर की मज़बूती उसकी नींव ही तय करती है, बिना एक मज़बूत नींव के एक सुदृढ़ घर की कल्पना करना ही बेकार है। एक बड़ी इमारत के बनने में सबसे ज्यादा वक़्त उसकी नींव तैयार करने में लगता है क्यूंकि बिना एक मजबूत नींव के इमारत खड़ी होना ही नामुमकिन है और अगर किसी तरह खड़ी भी हो गई तो आज नहीं तो कल उसका गिरना तय ही है। ठीक इसी तरह एक मजबूत रिश्ते के लिए उतनी ही मजबूत नींव की ज़रूरत होती है। कैसा भी रिश्ता हो अगर उसकी बुनियाद खोखली और नींव कमज़ोर है तो वो कभी एक सुनहरी सुबह नहीं देख पाती। ऐसे रिश्ते बस पूस के बादल की तरह होते है, दिखावटी, बिना पानी की एक भी बूंद के, बस वहां होने भर का एहसास कराती है लेकिन उनके पास देने को कुछ नहीं होता। रिश्ता चाहे प्यार का हो, दोस्ती का हो, भाई बहन का हो, मा...

उम्मीद की, हौसलों की उड़ान

उड़ने दो मुझे, ये मेरी उड़ान है दस्तक देते पल नए ये मेरे आने वाले कल की सौगात है उम्मीद की ये मेरे हौसले की उड़ान है रोको नहीं कदमों को बढ़ने दो टोको नहीं अरमानों को बढ़ने दो सपनों ने अभी बस आंखे ही खोली है इनके पंखों को भी उड़ान भरने दो जरूरी नहीं हम दुनिया के बने बनाए आदर्शों पर ही चले हमें भी अपनी राह चुनने दो अभी से हमें बड़ा ना करो थोड़ा बचपन हममें अभी रहने दो इस भीड़ में एक दिन तो सबको खोना ही है अभी थोड़ा शोर को जीने दो छोटी छोटी मस्तियां और शरारतों कि ये मेरे लम्हों की यादों की उड़ान है उम्मीद की ये मेरे हौसलों की उड़ान है लपक सितारे ले आएंगे हम चांद पर भी हो आएंगे वक़्त की मशीन बना हम ब्रह्मांड के कोनों को भी नाप आएंगे बस हमारी सोच को साथ हमारे बढ़ने, मचलने और खेलने दो इसे भी साथ हमारे चलने दो। दुनिया में एब बहुत है तरक्की की राहें भी कम नहीं है मत बढ़ाओ हमें भी उन राहों पे बस एक अच्छा इंसान बनने दो। राह अपने आप बन जाएंगे जब कदम नहीं डगमगाएंगे हिमालय की चोटी पर जाकर अपना परचम हम लहराएंगे बस मेरे भी एहसासों को कुछ रंग नए भरने दो। गिरकर उठना...

प्रिय पाठकों के नाम एक पत्र।

प्रिय पाठकगण, हमारा सप्रेम नमस्कार। आशा करते है आप सब सकुशल और मंगल होंगे और अपनी अपनी जिंदगीओं के धूप छांव तथा हर प्रकार के लम्हों को सराहनीय तरीके से व्यतीत कर रहे होंगे। यूं तो आजकल पत्रों का चलन नहीं रहा पर एक वक़्त था जब ये पत्र चिट्ठी ख़त और जाने किन किन नामों से बुलाए जाने वाले कागज़ के टुकड़े हमारे एहसासों, सवालातों, ख्यालातों, जज़्बातों और दिल में छुपी अनकही अनसुनी बातों को एक अल्फ़ाज़ देते थे, इन्हें एक आवाज़ देते थे एक जरिया थे इनको अपने मुकाम तक पहुंचाने का। हम भी इन्हीं उम्मीदों के साथ एक पत्र आप सबके नाम साझा कर रहे है। एक कोशिश कर रहे है अपनी खामोशियों को एक आवाज़ की शक्ल देकर आप तक पहुंचाने की। खामोशियों की भी अपनी अलग दुनिया है अपनी अलग विडंबना है। खामोशियां वो शब्द है जो दिल के दायरों में छुपे होते है, इनकी अपनी आवाज़ नहीं होती। इन खामोशियों को आवाज़ हमारे अल्फ़ाज़ देते है, इन्हें अपनी पहचान देते है। वो अल्फ़ाज़ जो जुबां पे तो नहीं आ पाते लेकिन दिल की कलम से पन्नों पर कैद हो जाते है। हमारे एहसास, जज़्बात और जिंदगी के छोटे बड़े, हस्ते रोते लम्हें इनमें रंग भरते ह...

दो दिल एक कहानी

मुझमें और तुममें काबिलियत है एक बहुत ख़ास दोस्त बनने की एक ऐसा दोस्त जो सिर्फ अपने नाम से नहीं, बल्कि एक दूसरे के नाम से पहचाने जाते है एक ऐसा दोस्त जो जिंदगी के हर धूप छांव में साथ खड़े रहते है हर तूफ़ान में भी चट्टान से डटे रहते है एक ऐसा हमकदम जो एकांत की उदासिओं को दोस्ती की चमक से रोशन कर देते है एक ऐसा साथी जो खुद भी ऊंचा उठता है और दूसरे का नाम भी फलक के दायरों में लिखता है। हां हममें काबिलियत है एक अदद दोस्त बनने की पर ये काबिलियत यूं ही नहीं है ये शायद तुम भी जानते हो। हमारे नाम अलग है पर सोच वही है बातें अलग है पर किस्से वही है हमारे जिस्म अलग है पर उनमें बसी रूह की तासीर वही है हमारी मंजिलें अलग है पर रास्ता वही कारवां भी वही है दिलों कि धड़कने अलग है पर उनके दायरों में बिखरी यादें वही है हम ख्वाबिदा नहीं है, पर ख्वाब एक से देखते है। राजदां भी नहीं है, मगर राज़ एक से रखते है। हममें काबिलियत है एक दूसरे को ऊंचा उठाने की अपनी मंजिलों को पास लाने की क्यूंकि हमारे बीच दिल, रूह और हस्ती को तोड़ने वाली इश्क़ की दीवार नहीं है हमारे बीच इकरार न...

अब तुमसे विदा लेता हूं

चलो तुम्हें आज़ाद करता हूं अपनी इस तन्हा जिंदगी से यूं तो तुम मेरे हुए नहीं कभी फिर भी जो ये एहसास कभी तुम्हारे नाम के थे आज इनसे विदा लेता हूं ये जो तुम्हारी बातें थीं जो कभी मेरे दिनों को यूं गुलज़ार करती थी तुम्हारी आहटें जो मुझे बेचैन कर देती थी कभी वो रूबरू होना तुमसे वो तुम्हारी यादों के साथ शाम से सहर होना तुम्हारे ही ख्वाबों के साथ हर रात हर राज़ बाटना अब इन सबसे भी विदा लेता हूं विदा लेता हूं कि अब लौट के वापस इन बायाबानो में फिर कदम नहीं लाऊंगा राब्ता तेरे नाम से जहां भी मैं पहचाना जाता था उन रास्तों से भी अब विदा लेता हूं चलता हूं कि हो सके तो याद रखना कभी तुम्हारी राहें बनाई थी कांटों को झेल कभी तुम्हें कलियों सा सजाया था तुम्हारी जिन्दगी तो नहीं बन सका पर याद रखना कि कम से कम एक ज़रिया भर ही था तुम्हारी तन्हाइयों, तुम्हारी ऊचाईयों का वक़्त बेवक्त वो दस्तक देती तुम्हारी हर बेचैनियों का। चलता हूं कि नए रास्ते अब पुकार रहे है जीने की जो थोड़ी लालसा दिल में दबी बची है वो आवाज़ दे बुला रहे है वो छोटे छोटे वक़्त के लम्हें जिनसे बुना उधरा ...

अगर कोई पूछे

अगर कोई तुमसे पूछे कौन हूं मैं कहना एक झोंका हवा का है रुख बदलने इन फिज़ाओं का जो दूर गुलिस्तां से आया है। अगर पूछे कोई तुमसे क्या हूं मैं कहना एक सिमटा लिबास है, जो ख़ामोशी की चादर में लिपटा अपने हिस्से की कहानियां बुन रहा है। अगर तुमसे कोई पूछे किस्से मेरे कहना अपने ही हालातों से टूटता बिखरता संवर के बनता हारा हुआ एक इंसान है। अगर कोई पूछ बैठे नाम मेरा कहना उसका नाम नहीं वजूद उसका उसकी कलम और आयतें उसकी पहचान है। अगर पूछे कोई क्या कर सकता हूं मैं कहना वो हर रूप इख्तियार हर काम मयस्सर कर सकता है खुशियां मुंतजर होती जिससे है। कभी कोई अगर पूछे कौन हो तुम कहना इस हयात-ए-सफर का एक हमसफ़र भर हूं राब्ता इतना ही है उससे की वो मेरे दिल को छूता है, मैं उसके कलमों में लिखी जाती हूं वो मेरी राहें बुनता है मैं उसे लड़खड़ाने से बचाती हूं शिकस्ता वो भी है, हस्सास मैं भी हूं चलना वो मुझे सिखाता है मैं जीना उसे सिखाती हूं। Like our page on Facebook

ग़ालिब की इबादत

ग़ालिब तुझे ख़ुदा मान बैठे है ये शायर भी खता खूब कर बैठे है तूने चंद बातें क्या कही दिल की तुझे ही दिल्लगी का देवता मान बैठे है दीवानगी की सौगातें क्या लिखी तूने तुझे दीवानों का मसीहा मान बैठे है इश्क़ की कलमे तूने खूब पढ़ी वाह वाही ये जमाने वाले लूट बैठे है इनायते तूने लिखी अपने इश्क़ की नाम इनपे हर आशिक़ लगा बैठे है चोट तो तूने भी खाई होगी गालिब दर्द तेरा दिल-ए-महरूम झेल बैठे है ग़ालिब तेरी बात और थी वो जमाने और थे दास्तानें और थी फ़लसफ़ा-ए-मोहब्बत की वो आफताबें और थी पर पन्नों पे इश्क़ लिखने वाले ये काफ़िर दिल में तेरी मूरत सजा बैठे है ग़ालिब तेरी इबादत खूब कर बैठे है ये शायर अब तुझे ख़ुदा मान बैठे है। Like our page on Facebook

शाम और उसकी याद

शामे मचल उठी है एक उसके ख्वाबों से दिन अभी डूबा ही है आसमां के किनारों से देखो चांद अभी निकला नहीं उसकी यादों का परवान मगर दिल में एक टीस लिए बैठा है, देखो चांद आ गया है आसमां में रात के दरिचों का दामन थामे उनका आना यूं तो मुमकिन नहीं लेकिन यादों की एक चिट्ठी भेजी है पढ़कर थोड़ी आहें भर लेना ये पैगाम भेजा है और इस चांद की ही तरह इन यादों के दामन में छुपकर ऐसे ही दरिचों के किनारे तकिए को मेरा कंधा बनाए इस रात की ख़ामोशी में खो जाना। सो जाना यूंही कि फिर हम ख्वाबों में मिलेंगे रात बाटेंगे जो दिल में तुम्हारे रह गई है उन बातों की एक चादर बनाएंगे ओढ़े उस चादर को दोनों साथ में ख्वाबों के सुनसान पड़े गलियारों को रौशन करेंगे करेंगे आबाद उन लम्हों को तुम्हारी आहों को बैचैन होती इन निग़ाहों को यूं सामने जो झिझक होती है तुम्हारी आंखों में ख्वाबों में उन पर्दों को हटा देना अपने दिल की कहना मेरे धड़कनों की सुनना जब बातों का कारवां थम जाए तो मेरी गोद में सर रख थोड़ी देर जुल्फों की छांव में बेचैनिओं को दम भरने देना बैठे रहेंगे कुछ देर यूहीं एक दूसरे का दामन था...

मेरी उम्मीद मेरी इबादत

मेरी उम्मीद वहीं तक है तेरा हौसला जहां तक मुझे राह दिखाता है। मेरी सादगी वहीं तक है तेरी संजीदगी जहां तक मुझे बेपरवाह बनाती है। मेरी चमक वहीं तक है तेरी चांदनी जहां तक इसे रोशनी दिखाती है। मेरी शराफत वहीं तक है तेरी हसी जहां तक इन्हें रास्ता दिखाती है। मेरे गीत वहीं तक है तेरे लफ्ज़ जहां तक इसके सुरों को सजाते है। मेरी शायरी वहीं तक है तेरे एहसास जहां तक इन्हें अल्फ़ाज़ बनाते है। मेरी सुबहें वहीं शाम भी वहीं तक है तेरा नाम जहां तक मेरे अज़ानों में सजते है। मेरी मंजिलें भी वहीं तक है तेरा रुतबा जहां तक मुझे ऊंचाईयां दिखाता है। और मेरी इबादतें भी वहीं तक है मेरे इश्क़ की बेनाम डगर जहां तुझे ख़ुदा बनाती है। Like our page on Facebook

शायद अब मेरी जरूरत नहीं

तुम्हें शायद मेरी अब जरूरत नहीं, या शायद हो भी, किसे पता तुमसे बेहतर तो ये कोई नहीं जान सकता फिर भी तुम्हारी ख़ामोशी ना चाहते हुए भी कुछ कह सी जाती है। तुम अपने आप में खोए रहते हो मैं भी चुपचाप तुम्हें देखता रहता हूं कोशिश करता हूं कि तुम्हारी ख़ामोशी को थोड़ा जान सकूं, पढ़ सकूं, समझ सकूं पर तुम्हें देख कर ठहर सा जाता हूं सोचता हूं शायद तुम कुछ कहोगे, पर कुछ आवाज़ सी आती नहीं फिर लगता है तुम्हारा हाल ही पूछ लूं इसी बहाने कुछ बात तो होगी, शायद तुम्हारी ख़ामोशी भी समझ जाऊंगा इसी बहाने थोड़ी जान पहचान भी बढ़ जाएगी तुम मुझको समझ पाओगे मैं भी शायद तुमको जान पाऊंगा पर तुम्हारे साथ ये ख़ामोशी भी आ जाती है, दीवार की तरह फिर लगता है शायद तुम्हें जरूरत नहीं किसी की या हो भी सकता है, ये मैं नहीं कह सकता सारा दिन इसी उधेड़बुन में निकल जाता है और बात वहीं आधी अधूरी सी रह जाती है मुझे तुम्हारे कुछ कहने का इंतजार रहता है शायद तुम्हें भी रहता होगा, पर कौन जाने ये शायद भी बहुत अजीब चीज़ है इसके चक्कर में जाने कितने बिछड़ जाते है और कितने बिखर जाते है पर ये शायद वही पड़ा रहता ह...

अगर तुम गलत ना समझो

अगर तुम गलत ना समझो तो एक बात कहूंगा तुम्हारे सहर को अपनी सुबह और सजर को अपनी शाम करूंगा दिल तो बचा नहीं खैर अब पर एक टुकड़ा तुम्हारे नाम करूंगा डरों नहीं तुमसे प्यार नहीं करूंगा बस तुम्हारे नाम को अपने नाम से एक अलग पहचान दूंगा हाथ नहीं थामुंगा तुम्हारा पर कदम दर कदम साथ चलूंगा तुम ठोकर खाओगे तो मैं भी गिरूंगा गिरना गलत नहीं है पर फिर उठकर मंजिल तुम्हारे नाम करूंगा अगर तुम गलत ना समझो तो एक बात कहूंगा अपनी खुशियों में से चंद तुम्हारे नाम करूंगा तुम्हारे गमों को अपने गम सा पहचान दूंगा तुम्हारी बेपरवाह मुस्कुराहट जिसे तुमने अपनी आंखों में छुपा दिया है उन्हें आजाद कर ये हसी अपने नाम करूंगा बेफिक्र रहो तुमसे इश्क़ नहीं करूंगा इकरार भी नहीं करूंगा, इज़हार भी नहीं करूंगा बस अपनी कलम से चंद आयाते तुम्हारे नाम लिखूंगा दरीचों के किनारे बैठ वक़्त बेवक्त तुमसे बात करूंगा कुछ अपनी कहूंगा कुछ तुम्हारी सुनूंगा बैठे रहेंगे एक दूसरे का दामन थामे पर तुम तुम ही रहोगे मैं भी मै ही रहूंगा इस पाक से रिश्ते को कोई नाम नहीं दूंगा अगर तुम गलत ना समझो तो फिर वही बात कहूंगा सह...

मेरी चाहत और कुछ पहलू

"पहला पहलू" मेरी चाहत के हिसाब से अगर बात होती तो ये कायनात, सारी कायनात मेरे साथ होती। मेरे दिल के हिसाब से अगर बात होती तो ये जुनून, सारा जुनून मेरे साथ होता जो मेरी आंखो के हिसाब से अगर बात होती तो ये नूर, आंखो का हर नूर मेरे साथ होता मेरे हाथों के हिसाब से अगर बात होती तो ये साथ और हाथों में मेरा हाथ होता मेरे कदमों के हिसाब से अगर बात होती तो हर मंजिल, दुनिया की हर मंजिल साथ होती जो मेरे इश्क़ के हिसाब से अगर बात होती तो ये जिंदगी, सारी जिंदगी बस तेरे नाम होती "दूसरा पहलू" मगर ऐसा हो ना सका अब ये आलम है कि कायनात नहीं, जुनून नहीं आंखों का नूर भी नहीं तेरा साथ और हाथों में हाथ नहीं दुनिया की वो मंजिलें भी नहीं जिंदगी है मगर तेरे नाम की नहीं सांसें भी है मगर वो एहसास नहीं खालीपन है कुछ यहां धड़कता सा है पर दिल नहीं "तीसरा पहलू" खैर यूं एक दिन चाहत भी मेरे हिसाब की होगी, बातें भी बस मेरे नाम की होगी दिल में जो थोड़ी है जुरअतें, उनसे अपनी पहचान बना बिखरूंगी, सवरूंगी, उरूंगी भी अरमानों ने जो मिटा दी धुंध की चादरें आंखों ...

कौन हो तुम, कौन हूं मैं

कौन हो तुम, कौन हूं मैं एक चेहरा ही तो है एक दिल भी है शायद टूटा हुआ सा, बिखरा हुआ सा हमेशा से ऐसा नहीं था मगर तुम्हारे अपने किस्से थे मेरी अपनी कहानियां थी दिल के हिस्से अपनी अपनी निशानियां थी मौजे थी, लहरें थी समुंदर के किनारे भी थे रेत पर पांवाे के निशा बनाते तुम भी थे मैं भी था फिर कुछ लहरें तेज अाई लौटते हुए के गई अपने साथ उन पांवो के निशानों को अब किनारों पर तन्हा खड़े तुम भी थे, मैं भी था फिर तुम राह अपनी चल दिए मैं डगर अपनी ढूंढने लगा अपनी अपनी कहानियां दिलो में लिए जब अचानक टकरा गए बीच राह में एक दिन तो दिल को एहसास हुआ तुम भी वही हो मैं भी वही चेहरा भले अलग अलग है पर दिलों की दास्तां, वो किस्से कहानियां दिलों में बसी अपनी अपनी निशानियां सब वही तो है नाम अलग है पर एहसास वही है फिर भी दोनों पूछ बैठे यूहीं कौन हो तुम, कौन हूं मैं एक आवाज़ अाई एक चेहरा ही है बस अपनी बीती हुई कहानियों का और आने वाली ऊंचाइयों का पर कल जब कोई पूछ बैठेगा कौन हो तुम, कौन हूं मैं तो ये जवाब मिलेगा एक चेहरा भी है, एक नाम भी है अपनी दुनिया से अलग एक पहचान भी है ...

खामोशियां - एक आवाज़

खामोशियां एक आवाज़ है, खामोशियां एक अल्फ़ाज़ है खामोशियां एक साज़ है जिसकी धुन पे नाचती रात है खामोशियां एक राज़ है सन्नाटे सुनने को जिसे बेताब है खामोशियां यादों की एक बूंद है ओस से लिपटी जिसकी हर सुबह और वही अकेली शाम है। Like our page on Facebook